गर्भ का अधिकार

पति-पत्नी के रिश्तों को अधिक न्यायपूर्ण बनाने के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पत्नी को गर्भपात के लिए पति की इजाजत की जरूरत नहीं है। वह अपनी मर्जी से इस बारे में फैसला कर सकती है। इस मामले में पति ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने साफतौर पर कहा था कि गर्भपात का निर्णय पत्नी का विशेषाधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की बल्कि इस संबंध में कानूनी स्थिति को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा साफ कर दिया। गौरतलब है कि इस मामले में पति और पत्नी के संबंध पहले से खराब चल रहे थे। तलाक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। लोक अदालत के प्रयास पर दोनों ने दोबारा साथ रहना शुरू किया। कुछ समय बाद पत्नी को प्रेग्नेंसी का पता चला, पर दोनों के बीच अच्छे संबंध की गुंजाइश न देखते हुए उसने गर्भपात का फैसला किया। पति ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद पत्नी ने उसकी मर्जी के बगैर ही अबॉर्शन करा लिया। पत्नी के इस फैसले से नाराज पति ने पत्नी, साले और ससुर सहित हॉस्पिटल के डॉक्टर्स पर 30 लाख रुपये का दावा ठोक दिया। उसका दावा था कि पत्नी के इस काम से उसे अत्यधिक मानसिक पीड़ा हुई है।हाईकोर्ट ने पीड़ा के उसके तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी ने वैवाहिक सेक्स के लिए सहमति दी तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि उसने गर्भधारण के लिए भी सहमति दी है। यह उसकी मर्जी पर निर्भर करता है कि वह बच्चे को जन्म दे या न दे। पति उसे इसके लिए मजबूर नहीं कर सकता। हाईकोर्ट के इस स्पष्ट रुख को और मजबूती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि मानसिक रूप से कमजोर महिला को भी अबॉर्शन कराने का पूरा अधिकार होता है। अपने यहां पति को परिवार का पालनकर्ता मानने की परंपरा ने पत्नी को अनेकानेक सहज मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर रखा है। ऐसे फैसले न केवल इस पारंपरिक नजरिए में बदलाव की जरूरत बताते हैं बल्कि कानून की शक्ति से उसे अमल में भी लाते हैं। इनका खुले दिल से स्वागत होना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *