छोटे हथियारों की खरीद

विश्व की दूसरी सबसे बड़ी स्थल सेना के हाथों में अत्याधुनिक हथियार पहुंचाने की कवायद शुरू हो चुकी है। जल्द ही हथियारों की खरीद के फैसले लेने वाली संस्था रक्षा अधिग्रहण परिषद इन हथियारों की खरीद को मंजूरी दे देगी। मंजूरी मिलने के बाद सेना के लिए सात लाख राइफलें, 44 हजार लाइट मशीनगनें और तकरीबन 44,600 कार्बाइनें खरीदी जाएंगी, जिनकी कीमत 40 हजार करोड़ रुपयों के आसपास बैठेगी। खरीदारी प्रक्रिया शुरू करते हुए सरकार ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) से कहा है कि वह छोटे हथियारों पर जो भी काम कर रहा है, उसमें तेजी लाए। रक्षा क्षेत्र के निजीकरण के बाद सेना के लिए दिया गया यह सबसे बड़ा ऑर्डर होगा। कार्बाइन के लिए रक्षा अधिग्रहण परिषद ने इसी साल जून में ऑर्डर जारी कर दिया था, लेकिन टेंडर प्रक्रिया में सिर्फ एक ही कंपनी के रह जाने के कारण उसे रद्द कर दिया गया। उधर डीआरडीओ को भी हल्की मशीनगन का डिजाइन तैयार करके सेना को देना था, लेकिन वह तय समय सीमा पर उसे तैयार नहीं कर पाया।
हल्का लड़ाकू विमान तेजस हो या नाग मिसाइल, या फिर जमीन से जमीन पर मार करने वाले मिसाइल प्रॉजेक्ट, डीआरडीओ इनमें से कोई भी काम डेडलाइन बीतने तक पूरा नहीं कर पाया है। ऐसे में रक्षा क्षेत्र से जुड़ी स्वदेशी कंपनियां अगर यह ऑर्डर पाना चाहती हैं तो इसके लिए उन्हें विदेशी कंपनियों पर ही निर्भर होना पड़ेगा। कारण यह कि अपने यहां आधुनिकतम हथियार बनाने का कोई ढांचा ही विकसित नहीं हो पाया है। आजादी मिलने के बाद से विदेशों से हथियार मंगाते रहने और स्वदेशी विकल्पों के लगातार फेल होने के कारण स्थिति दिनोंदिन गंभीर ही होती गई है। पिछले तीन सालों से आईआईटी और डीआरडीओ साथ में काम करके तकनीक विकसित करने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन वह भी किसी मुकाम तक नहीं पहुंच पाई है।हथियार निर्माण के अमेरिकी मॉडल का अनुसरण करते हुए एक साल पहले सेना में आर्मी डिजाइन ब्यूरो भी बनाया गया, जिसने अभी तक जिक्र लायक कोई काम नहीं किया। ऐसे में हथियार खरीद की यह बड़ी योजना भारतीय कंपनियों से मिलकर काम करने वाली विदेशी हथियार कंपनियों के लिए एक बड़ी ऑर्डर बुक तैयार करने जैसी ही लग रही है।

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