हादसे के बाद

रायबरेली के ऊंचाहार पॉवर स्टेशन की एक यूनिट में बुधवार को हुआ हादसा चौंकाने वाला है। एनटीपीसी में अब तक के कुछ सबसे भीषण हादसों में एक इस घटना के कारणों का अभी तक कुछ पता नहीं चला है, लेकिन बॉयलर के स्टीम पाइप का फटना कोई सामान्य बात नहीं है। खासकर इसलिए कि सुरक्षा मानकों के पालन में एनटीपीसी का रेकॉर्ड अच्छा रहा है। 1550 मेगावाट क्षमता वाले इस प्लांट से उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, चंडीगढ़, दिल्ली और उत्तराखंड तक को बिजली सप्लाई की जाती है। 500 मेगावाट की जिस यूनिट में हादसा हुआ, उसे अभी बंद कर दिया गया है, लेकिन बाकी पांचों यूनिटों में काम जारी है। दुर्घटनाग्रस्त छठीं यूनिट नई थी और यह अभी ट्रायल फेज में ही थी।
शुरुआती सूचनाओं में यह भी कहा गया कि इसमें कुछ गड़बडिय़ों की आशंका जताई गई थी, जिन्हें ठीक करने के लिए 28 अक्टूबर को काम रोका जाना था। मगर किसी वजह से ऐसा हो नहीं पाया। इस बात की आधिकारिक पुष्टि होनी अभी बाकी है, लेकिन इस हादसे ने एनटीपीसी के संचालन के तरीकों और संयंत्र में लगे उपकरणों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस प्लांट के लिए सारे संयंत्रों की सप्लाई भेल (भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड) की ओर से की गई थी। ऐसे में जाहिर है कि जांच का दायरा एनटीपीसी के साथ-साथ भेल को भी छुएगा।
हादसे के बाद राहुल गांधी के घटनास्थल पर जाने को लेकर सत्तारूढ़ बीजेपी के बयानों में जिस तरह से ‘ट्रैजडी टूरिज्म’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, उससे लगता है कि ऐसी गंभीर दुर्घटना के वक्त भी सरकारी दायरे में राजनीतिक नफा-नुकसान की भावना हावी है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि देश की कुल ऊर्जा उत्पादन क्षमता (329,298.27 मेगावाट) का 16 फीसदी हिस्सा (51,653 मेगावाट) एनटीपीसी पूरा करता है। ऐसे में इस हादसे के बाद यह जरूरी है कि इसकी जांच को महज औपचारिकता या तक सीमित न रहने दिया जाए। निष्पक्ष जांच के बाद जिस भी स्तर पर गड़बडिय़ां पाई जाएं उनका ठोस निदान किया जाना चाहिए।