न्यायिक नियुक्तियों में तेज़ी की आस

अनूप भटनागर
न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादलों की प्रक्रिया को लेकर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच गतिरोध शीघ्र दूर होने की उम्मीद है। इससे उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया गति पकड़ेगी जो उच्च न्यायालयों में बडी संख्या में लंबित मुकदमों के तेजी से निबटारे में भी मदद होगी। उम्मीद की वजह उच्चतम न्यायालय के प्रशासनिक और न्यायिक पक्ष में उठाये गये तीन महत्वपूर्ण कदम हैं।
उच्चतम न्यायालय की कोलेजियम ने उच्च न्यायालयों के अतिरिक्त न्यायाधीशों के कामकाज के आकलन की व्यवस्था समाप्त करने के फैसले पर केन्द्र की आपत्ति के मद्देनजर कुछ सुधार के साथ इसे पुन: लागू करने और न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादले की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के इरादे से इस संबंध में की जाने वाली सिफारिशें न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड करने के प्रशासनिक निर्णय लिये हैं।
शीर्ष अदालत न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादले से संबंधित मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) को अंतिम रूप देने में विलंब को देखते हुए इस पर विचार करने के लिये राजी हो गयी है। न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति उदय यू ललित की दो सदस्यीय पीठ के इस संबंध में न्यायिक आदेश को सारे गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में ठोस पहल के रूप में देखा जा रहा है। पीठ ने स्वीकार किया है कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून निरस्त करने वाली संविधान पीठ ने अक्तूबर, 2015 के अपने फैसले में हालांकि मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर को अंतिम रूप देने के लिये कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की थी, लेकिन इस मुद्दे को अनंतकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता है। उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीशों को स्थाई बनाने से पहले उनके काम के आकलन के लिये अक्तूबर, 2010 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एस एच कपाडिय़ा ने कुछ दिशा निर्देश जारी किये थे। लेकिन दस साल से चल रही प्रक्रिया इस साल तीन मार्च को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर ने समाप्त कर दी थी।
केन्द्र सरकार की आपत्ति के मद्देनजर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय कोलेजियम ने पिछले सप्ताह सर्वसम्मति से तीन मार्च के निर्णय में थोड़ा सुधार कर दिया। नयी व्यवस्था के तहत अतिरिक्त न्यायाधीशों के कामकाज के आकलन की व्यवस्था बहाल की गयी है। अब इन अतिरिक्त न्यायाधीशों के फैसलों का आकलन उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों की समिति करेगी। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून निरस्त करने वाली संविधान पीठ के बहुमत के फैसले में ही न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादले की प्रक्रिया पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से प्रधान न्यायाधीश की स्वीकृति से एक पूरक मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर बनाने का निर्देश दिया गया था। केन्द्र सरकार ने हालांकि अक्तूबर, 2015 के फैसले के बाद ही इसका मसौदा तैयार करके तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर के पास भेजा था लेकिन इसके कुछ प्रावधानों पर असहमति की वजह से यह सिलसिला आगे नहीं बढ सका। न्यायमूर्ति ठाकुर के बाद प्रधान न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति खेहर के कार्यकाल में भी स्थिति कमोबेश जस की तस ही रही।
इस गतिरोध की वजह से आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना, कलकत्ता, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड और मणिपुर उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश नहीं हैं। इनमें इस समय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ही काम देख रहे हैं। शायद इसी गतिरोध का नतीजा है कि 2016 में सर्वाधिक 125 न्यायाधीशों की नियुक्ति करने के बावजूद उच्च न्यायालयों में अभी भी करीब चार सौ पद रिक्त हैं। उच्चतम न्यायालय में रिक्त पदों की संख्या छह है। बहरहाल, न्यायाधीशों के रिक्त पदों की बढ़ती संख्या और मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर को अंतिम रूप देने में हो रहे विलंब को लेकर वकील आर पी लूथरा ने नये सिरे से उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता के वी विश्वनाथन को न्याय मित्र नियुक्त करने के साथ ही अटॉर्नी जनरल से जवाब भी मांगा है। न्यायालय इस मामले में 14 नवंबर को आगे विचार करेगा। मेमोरैंडम ऑफ प्रोसीजर के नये प्रारूप को मंजूरी देने में दो बिन्दु मुख्य रूप से बाधक हैं। पहला तो इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। यह प्रावधान सरकार को न्यायाधीश पद के लिये मिले किसी भी नाम की सिफारिश अस्वीकार करने का अधिकार देता है जबकि दूसरा बिन्दु न्यायाधीशों के बारे में मिलने वाली शिकायतों के समाधान के लिये अलग समिति बनाने का है। चूंकि न्यायाधीशों के नामों के चयन, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव की चर्चा होती रही है इसीलिए सरकार चाहती है कि न्यायाधीशों के बारे में मिलने वाली शिकायतों की जांच और उनकी विवेचना के लिये उच्चतम न्यायालय और सभी उच्च न्यायालयों में तीन पीठासीन न्यायाधीशों की एक अलग से समिति हो जो सिर्फ न्यायाधीशों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों पर विचार करेगी। न्यायाधीशों के चयन और नियुक्तियों के लिये नामों की सिफारिश करने वाली समिति इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण के रूप में देखती है। हालांकि सरकार इसे किसी प्रकार का अतिक्रमण नहीं मानती क्योंकि इस समिति के सदस्य पीठासीन न्यायाधीश ही होंगे और यह एक आंतरिक व्यवस्था होगी।