सिनेमा और सर्कस

अगले हफ्ते गोवा में शुरू हो रहा 48वां इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (आईएफएफआई) अभी से विवादों में फंस गया है। 13 सदस्यीय जूरी ने इंडियन पैनोरमा सेक्शन के लिए आई 153 फिल्में देखकर उनमें से जिन 26 को प्रदर्शन के लिए चुना था, उनमें से दो- रवि जाधव की मराठी फिल्म ‘न्यूड’ और शशिधरन की मलयाली फिल्म ‘एस दुर्गा’ को सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने आखिरी पलों में सूची से निकाल दिया। नतीजा यह हुआ कि जूरी के हेड और जाने-माने फिल्म निर्देशक सुजॉय घोष ने इस्तीफा दे दिया। अगले दिन एक और जूरी सदस्य अपूर्व असरानी ने भी त्यागपत्र की घोषणा कर दी।दोनों फिल्मों के निर्देशकों ने भी मंत्रालय से जवाब तलब किया है कि आखिर किस आधार पर उनकी फिल्मों को प्रदर्शित होने वाली फिल्मों की सूची से बाहर किया गया है। माना जा रहा है कि दोनों फिल्मों के नाम मंत्रालय अधिकारियों को नहीं जंचे। इसी तर्ज पर और इसके काफी पहले से उत्तर भारत के कई इलाकों में ‘पद्मावती’ फिल्म को लेकर भी हंगामा बरपा हुआ है। कई ऐसे संगठन हैं जिन्हें इस फिल्म में महारानी पद्मावती का चित्रण नहीं जंच रहा। इस सिलसिले में एक बार फिल्म सेट को आग लगाई जा चुकी है और निर्देशक के साथ मार-पीट भी की जा चुकी है। कहा जा रहा है कि यह फिल्म पहले एक समुदाय विशेष के प्रतिनिधियों को दिखाई जाए और उनकी मंजूरी मिलने के बाद ही सिनेमा हॉलों में प्रदर्शित की जाए। फिल्म अभी सेंसर बोर्ड के पास नहीं गई है लेकिन बोर्ड की राय जानने का धैर्य किसे है? इन दोनों प्रसंगों से साफ है कि अपने यहां न तो सरकार को फिल्मकारों, जूरी और दर्शकों के विवेक पर भरोसा है, न ही ‘आहत होने वाले’ दर्शकों को सेंसर बोर्ड पर भरोसा है। ऐसे में तर्कसंगत बात यही होगी कि फिल्में बनाने का काम सरकार अपने हाथ में ले ले और इन्हें सेंसर करने का काम विभिन्न धर्मों, जातियों के नेताओं को सौंप दिया जाए! क्या हम कभी ठहर कर सोचेंगे कि इतिहास में पीछे की तरफ जारी यह यात्रा एक समाज के तौर पर हमें कहां ले जाएगी?

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