बेशक वक्त के साथ चढ़ गई परवान वरनी, टाकें की और खनोड़ी शादीयां

-सराज में आज भी होती बिना लाग लपेट की शादियां
-देवता के सम्मान के लिए नहीं पहना जाता है सेहरा न ही बैठते है पालकी पर
संवाददाता,
मंडी, 03 दिसंबर। वैसे तो शादीयों की रस्म में दुल्हा सेहरा न पहनें या घोड़ी या पालकी न चढ़े तो शायद ही कोई उसे शादी माने । मगर बिना फेरे से शादी हो जाए तो यह बात सुनने वालों को कुछ हजम न हो । मगर ये सच्च है कि मंडी जिला के सराज में एक ऐसा गांव है जहां देव इच्छा के सम्मान के लिए न सेहरा लगाया जाता है और न ही सात फेरे होते है । जबकि शादी को सात फेरों का बंधन माना जाता है।
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देवता के सम्मान के लिए
इस शादी को सराज में वरनी शादी कहा जाता है । सराज के प्रसिद्ध देवता बड़ा देव विष्णु मतलोड़ा के सम्मान में आज भी ये वरनी शादी की जाती है । पहाड़ी में वरनी को छोटी शादी कहा जाता है । माना जाता है कि अगर दुल्हा पालकी पर बैठता है तो वह देवता के रथ के बराबर हो जाएगा । जबकि सेहरा लगाने की भी मनाही है । ये सब देवता के सम्मान के खातिर ही होता है । इन शादीयों में आज भी दहेज देना और लेना बुरा माना जाता है । जबकि आजकल पढ़े लिखे समाज में बेटियों से दहेज लेने का कारोबार बढ़ गया है । जबकि ये शादीयों अभी बीस से पच्चीस साल पहले हुआ करती थी । मगर कुछ लोगों ने इसे अभी जिंदा रखा है ।
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जब खनौर ही ले आता था लडक़ी
देवता बिठु नारायण के पुजारी औत राम शर्मा ने बताया कि प्राचीन काल में लोग इतने संपन्न नहीं थे । इस वजह से शादीयां भी बड़े साधारण तरीक्के से होती थी । कई लोग भागकर शादी कर लेते थे । जिसे टांके की शादी कहते थे । जबकि आमतौर पर जो व्यक्ति शादी की बात करवाता था उसे सराजी भाषा में खनौर बोला जाता है । वही खनोड़ अपने साथ दुल्हन को लेकर आ जाता था । यानि दूल्हे को बारात लाने और ले जाने की जरूरत नहीं होती थी । इस तरह ये शादी भी बिना फेरे की ही होती थी ।
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वक्त के साथ बदली संस्कृति
औत राम शर्मा ने बताया कि अब तो सराज में शहरी रस्मों रिवाज के साथ शादीयां हो रही है । पहले लोग इतने संपन्न नहीं थे । मगर अब संपन्नता आने से दहेज के जरिए शादीयां करना और करवाना आम हो गया है । मगर आज भी कई लोग ऐसे है । जिन्होंने आधुनिक होने के बाबजूद अपनी देव पंरपरा को जिंदा रखा है ।

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