क्या चुरहट में कांग्रेस के अजेय किले को भेद पाएंगे बीजेपी के चाणक्य!
उमा शंकर तिवारी
सीधी। बीजेपी के चाणक्य अमित शाह ने इस बार सबसे कड़ी चुनौती स्वीकारी है। पिछले 20 वर्षों से एकछत्र राज कर रहे कांग्रेस के अजेय किले में सेंध लगाने की तैयारी कर रही है। बीजेपी का जहां दावा है कि वो इस बार किले को आसानी से ध्वस्थ कर लेंगे, वहीं कांग्रेस अपनी सुरक्षा को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त है। अब ये तो 28 नवंबर को ही तय होगा कि किले में किसका कब्जा होगा, फिलहाल देखने वाली बात है कि बीजेपी की तरफ से इस बार कौन सी रणनीति रहेगी।
चुरहट विधानसभा सीधी जिले की ऐसी सीट है जहां पहुंचते ही आपको मूलभूत समस्याओं के दर्शन हो जाएंगे। शहर के मुख्य बाजार की सड़क तो पांच वर्ष में शायद ही कभी ठीक रही है, इसके अलावा यहां जाम और अतिक्रमण ने लोगों को परेशान कर रखा है। दो किलोमीटर की दूरी तय करने में आपको पंद्रह से बीस मिनट लग जाते है वो भी तब जब जाम न लगा हो। बात स्वास्थ्य की है तो स्थिति बुरे हाल है। थोड़ी भी स्थिति खराब होने पर आपको इलाज के लिए या तो सीधी जाना पड़ता है या फिर रीवा। कुछ ऐसी ही दास्तान शिक्षा की है, रोजगार के सीमित साधन है। यानि कहा जाए तो मूलभूत सुविधाओं की स्थिति डांवाडोल है। ये बातें यहां इसलिए की जा रही है कि चुरहट के हालात हमेशा से कुछ ऐसे ही रहे है। पिछले 20 वर्षों से यहां के हालात में कोई खास सुधार नहीं हुआ। इसके बाद भी कांग्रेस के अजय प्रताप सिंह यानि की राहुल भैय्या आराम से चुनाव जीतते आ रहे हैं।
बीजेपी क्यों नहीं भुना पाती मुद्दे को?
चुरहट विधानसभा को लेकर हमेशा से ही बीजेपी बैकफुट पर रही है। बड़े मुद्दे होने के बावजूद बीजेपी कांग्रेस के इस अजेय किले को जीतने में नाकामयाब ही रही है। वर्ष में जब पूरे प्रदेश में शिवराज की लहर चली, उस वक्त भी चुरहट में कुछ नहीं बदल सका। यानि की बीजेपी यहां के मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने में नाकाम रही है।
आखिर बीजेपी क्यों नहीं भेद पाती चुरहट का किला?
चुरहट सीट से बीजेपी क्यों नहीं जीत पाती इसका सबसे अच्छा जवाब बीजेपी के ही पास है। बूथ लेवल पर गौर किया जाए तो बीजेपी यहां कभी जीतने का प्रयास ही नहीं करती। पिछले बार शरतेंदु तिवारी ने जोरदार टक्कर दी थी, पर अपनों के मिले धोखे ने बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। बीजेपी के कई बड़े चेहरों ने अंतिम समय में यहां कांग्रेस का अंदरूनी समर्थन कर दिया। जिसका खामियाजा 2013 में बीजेपी को दूसरे नंबर पर रहकर भुगतना पड़ा। हालांकि इन बड़े चेहरों का भी काफी नुकसान 2014 से लेकर अब तक देखने को मिल रहा है।
क्या भितरघात को अमित शाह रोक पाएंगे?
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मध्यप्रदेश में चुनाव अभियान की बिगुल फूंक चुके हैं। अपनी तूफानी जनसभाओं के साथ ही अमित शाह का मुख्य उद्देश्य पार्टी की चुनावी कैंपेनिंग का निरीक्षण करना है। अमित शाह 2013 वाली स्थिति को दोहराना नहीं चाहते। यही कारण है कि उन्होंने जनसभा का चयन चुरहट क्षेत्र किया। इसके साथ ही उन्होंने बीजेपी के भितरघात करने वाले नेताओं को भी स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं।
अमित शाह ने पहले ही भिजवा दिया है संदेश
बीजेपी के अमित शाह अपने चुनाव प्रचार की कूटनीति बेहद बारीकी ढंग से करते है। वो जहां प्रचार पर जाते है उससे पहले अपने खास लोगों को क्षेत्र की पूरी जानकारी का ब्यौरा जुटाने के लिए भेज देते हैं। कुल मिलाकर कहे कि बीजेपी प्रचार की बी टीम। ये टीम प्रचार से पहले उस क्षेत्र के स्थानीय नेताओं के साथ जनता की नब्ज टटोलते हैं। अमित शाह की रैली के दो दिन पहले से दो दिन बाद तक का पूरा फीडबैक तैयार किया जाता है। इसके बाद जो कमी रह जाती है उसे दूर किया जाता है।
डा. अरविंद यादव ने डाले हुए हैं सीधी में डेरा
अमित शाह के करीबी हरियाणा बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष डा. अरविंद यादव 15 तारीख को सीधी में है। प्रभात झा भी क्षेत्र का निरीक्षण कर चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक डा. अरविंद यादव को सीधी के कार्यकताओं से फीडबैक अच्छा नहीं मिल रहा है। जिलास्तर पर संगठन के बीच में चल रही खींचतान और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल की कमी इस चुनाव में बीजेपी के लिए चिंता का सबब बनी हुई है।