सीमा सड़क संगठन जनजातियों की भाग्य रेखा… ही राम गॉड

हमेशा विपरीत परिस्थिति में जूझते रहते हैं बीआरओ के जवान
कमलेश वर्मा(परी)
कुल्लू, 27 नवबंर। शीतमरुस्थल जनजातीय ज़िला लाहुल स्पीति तथा पांगी की सड़कों का जिम्मा सीमा सड़क संगठन के पास है और संगठन के जवान दिन रात सड़कों में जूझते नजर आते हैं। यह शब्द लाहुल के उदयपुर निवासी प्रसिद्ध समाजसेवी ही राम गॉड ने कही है।गौर रहे गॉड शिपिंग कर्पिरेशन ऑफ इंडिया से बतौर थर्ड इंजीनियर अपने सेवा काल के शेष 7 वर्ष की नोकरी त्याग कर लाहुल स्पीति की जनता की सेवा भाव से आ गए है और हर समाजिक कार्य मे बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे है।हर समाजिक कार्यों में अपना मुख्य किरदार निभाने के इलावा उदयपुर में हर किसी जरूरतमंद को यथा उचित मदद करने में कभी पीछे नही हटते है।हाल ही दिनों अचानक हुए बर्फ बारी से बंद हुए रोहतांग दर्रे को बीआरओ द्वारा बिल्कुल कम समय मे खोल कर लाहुल तथा पांगी के लोगों को राहत पहुंचना किसी से भी छुपा नही है।ही राम गॉड ने कहा कि सीमा सड़क संगठन के अधिकारी और जवान हमेशा विपरीत परिस्थिति में जूझते रहते हैं।इन्हे किसी भी मौसम में कार्य करना आसान नही है।खास कर बर्फ के दौरान और माइनस 30 से 35 डिग्री तापमान में इन्हें विश्व के सबसे ऊंचे दर्रो पर काम करते हुए देखा जा सकता है चाहे फिर वह खड़डुंगला हो या बारलाचा या फिर रोहतांग हो या कुंजम जोत।गॉड के मुताविक लगातार ग्लेशियरों का सामना करना और खिसकते चट्टानों को सिर पर सहरे की तरह धारण कर चलना पूरे देश के अंदर सिर्फ सीमा सड़क संगठन के लोगो मे ही देखा जा सकता है।अपने सेवा काल मे 35 देश घूम चुके ही राम गॉड कहते है कि किसी भी इलाके का भला तभी हो सकता है जब वहां की सड़कें बेहतर हो।उन्होंने सीमा सड़क संगठन के 38 कृतिक बल के कमांडर ए के अवस्थी और 70 आर सी सी के ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट कर्नल ए विजया कुमार तथा उदयपुर सेक्टर के 94 आर सी सी के ऑफिसर कमांडिंग एस एस देशपांडे तथा उनके टीम का हाल ही के दिनों हुए हिमपात से घाटी के अंदरूनी सड़कों और खास कर रोहतांग दर्रे को खोल कर लोगो को राहत प्रदान करने पर हार्दिक बधाई देते हुए भूरी भूरी प्रशंसा की है।गॉड बताते है कि अगर रोहतांग नही खुलता तो राज्य सरकार पर हजारों लोगों का हेलीकॉप्टर उड़ान का ही अतिरिक्त भार पड़ जाता और सैंकड़ों वाहन भी रोहतांग के इस पार और उस पार ही फंस जाते।यही नही लोगों को अपने अपने घरों के लिये जरूरी सामान भी ले जाना था जो रोहतांग दर्रे के खुलने से ही सम्भव हो पाया।

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