दोस्ती और दबदबा

अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन भारत आने से पहले पाकिस्तान गए थे, लेकिन दोनों देशों में दिए उनके बयानों से साफ है कि अमेरिका की नजर में भारत की अहमियत कहीं ज्यादा है। दिलचस्प बात है कि पाकिस्तान से अपना फासला हमें चाहे जितना भी ज्यादा दिखता हो, अमेरिकी नीति निर्माता दोनों देशों को एक-दूसरे के गले पर सवार पड़ोसियों के रूप में ही देखते रहे हैंपहली बार 2005 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश और मनमोहन सिंह की परमाणु वार्ता के दौरान ऐसा ठोस संकेत गया कि अमेरिका अब भारत को पाकिस्तान से जोड़कर देखने का सिलसिला तोड़ रहा है। बुश के बाद ओबामा के दौर में यह बात शीशे की तरह साफ हो गई कि अमेरिकी नजरिया भारत को अपने ग्लोबल साथी के रूप में पहचानने का है, जबकि पाकिस्तान कई वजहों से उसके लिए बोझ की शक्ल लेता जा रहा है। रेक्स टिलरसन की हालिया यात्रा ने इस प्रवृत्ति को और गहरे तक रेखांकित किया है। टिलरसन ने पाकिस्तान में कहा और फिर भारत में भी दोहराया कि आतंक के अड्डे वहां चलने नहीं दिए जा सकते। अफगानिस्तान में भारत की ज्यादा बड़ी भूमिका का आग्रह भी अमेरिका के मैत्रीपूर्ण रुख का संकेत है, हालांकि वहां सैनिक भेजने का अमेरिकी अनुरोध भारत पहले ही दो टूक ढंग से ठुकरा चुका है। इसके बावजूद अगर भारत की भूमिका बढ़ाने की बात हो रही है तो साफ है कि यह प्रस्ताव भारतीय योजनाओं के अनुरूप है। अमेरिका ने भारत को अत्याधुनिक सामरिक तकनीक देने की भी तैयारी दिखाई है। बेशक, इन प्रस्तावों पर ठोस निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले इन्हें बारीकी में परखने की जरूरत होगी।
मगर भारत को थोड़ा बलपूर्वक अपने हितों की राह पर खींचने की अमेरिकी कोशिशों का अंदाजा इस बात से मिलता है कि टिलरसन ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से बातचीत में यह मुद्दा भी उठाया कि नॉर्थ कोरिया में भारतीय दूतावास अभी तक कैसे कायम है? सुषमा स्वराज ने यह कहते हुए बात टाल दी कि अमेरिका के कुछ दोस्तों के दूतावास उत्तर कोरिया में बने रहने चाहिए, ताकि बातचीत की खिड़कियां खुली रहें। बहरहाल, अमेरिका को बीच-बीच में यह एहसास भी दिलाते रहना जरूरी है कि उसके साथ भारत की दोस्ती चाहे जितनी भी गहरी हो जाए, लेकिन हमारी विदेश नीति अपनी प्राथमिकताओं से ही चलेगी।

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