पर्यावरण के नाम पर बिना सोचे समझे की गई इलेक्ट्रिक कैबों व बसों की खरीददारी एचआरटीसी के गले फंस गई

संवावदाता,
मंडी, 24 नवबंर। धरातल की आवश्यकताओं व ढांचागत सुविधाओं का आकलन किए बगैर सरकारी पैसे से अंधाधुंध खरीद करने की मिसाल देखनी हो तो एचआरटीसी से बढ़िया और कोई जगह नहीं हो सकती। हिमाचल प्रदेश में पर्यावरण के नाम पर बिना सोचे समझे की गई इलेक्ट्रिक कैबों व बसों की खरीददारी अब एचआरटीसी के लिए बोझ बन गई है। यह करोड़ों की खरीदी बिना कोई ग्राउंड वर्क किए ही कर डाली है। जहां अभी तक इलेक्ट्रिक बसों के लिए चार्जिंग स्टेशन तक उपलब्ध नहीं हो पाया है तो हर क्षेत्रीय डिपो में भेजी गई ए राइड विद प्राइडए के आकर्षक स्लोगन वाली इलेक्ट्रिक कैबें भी जंग खा रही हैं। लगभग दस लाख की एक कैब है और हर डिपो में इन्हें शो पीस की तरह खड़ा कर दिया गया है मगर न तो इनका कोई परमिट है और न कोई रूट ही फिक्स है। यही नहीं प्रबंधन के पास स्टाफ भी नही है।
यह सेवन प्लस डी इलेक्ट्रिक कैब यानि सात सवारियां और चालक के लिए यह बनाई गई हैं। सूत्रों के अनुसार कई क्षेत्रीय प्रबंधकों ने इन्हें चलाने से हाथ खड़े कर दिए हैं क्योंकि उनके पास न तो इनकी चार्जिंग व्यवस्था ही पर्याप्त है और न उन्हें यह फायदे का सौदा लगता है। उपर से जो बड़ी बसें पहले से नियमित रूटों पर चल रही हैं उनके लिए ही चालकों की कमी है तो फिर इन छोटी कैब को कौन चलाएगा। अब यह निगम के गले की फांस बन गई हैं। प्रदेश में यदि 18 दिसंबर के बाद सत्ता परिवर्तन होता है तो इन कैबों की बिना सोचे समझे खरीद का मामला तूल पकड़ सकता है और जिम्मेवार अधिकारियों पर गाज गिर सकती है। अभी भले ही अधिकारी इन्हें
चलाने के लिए आचार संहिता की आड़ ले रहे हों मगर इसका जवाब किसी के पास नहीं है कि जब जमीनी स्तर पर इनकी जरूरत ही नहीं थी और पहले से तैयारी ही नहीं थी तो चुनावों से ठीक पहले इन्हें खरीदने की जल्दबाजी क्यों की गई। इस बारे में जब मंडलीय प्रबंधक मंडी मंडल एएन सलारिया से बात की गई तो उन्होंने बताया कि जल्द ही इसके लिए रूट परमिट अप्लाई किए जाएंगे और फिर इन बसों को शहरों के अंदर स्थानीय लोगों की सुविधा के लिए चलाया जाएगा। जहां तक चार्जिंग की बात है तो कैब को सामान्य इलेक्ट्रिक शॉकट से चार्ज किया जा सकता है। उन्होंने माना कि अभी ये कैब बिना चले ही खड़ी कर रखी हैं।

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