विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी मनाली से जुड़ी हैं चाचा नेहरू की खास यादें

आज भी मनाली के रैस्ट हाउस में मौजूद है नेहरू द्वारा इस्तेमाल की गई चीजें
कमलेश वर्मा(परी)
कुल्लू,13 नवंबर। विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी मनाली देश के दो प्रधानमंत्रियों पं.जवाहर लाल नेहरू व अटल बिहारी वाजपेयी के आगमन के चलते देश-विदेश में चर्चा का केंद्र बिंदू रही है। एक तरफ जहां मनाली के प्रीणी में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना आशियाना बनाया हुआ है वहीं, दूसरी तरफ देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू का भी मनाली से खासा लगाव रहा है। श्री नेहरू जब पहली बार मनाली आए थे तो उस समय उनके द्वारा प्रयोग की गई चीजों को आज भी धरोहर की तरह मनाली में संभालकर रख गया है। परिधि गृह मनाली में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की यादों कों हमेशा के लिए सहज कर रखा गया है। जब देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू पहली बार मनाली आए थे तो वह इसी भवन में ठहरे थे और उस वक्त उन्होंने जो सामान यहां पर प्रयोग किया था उसे सहेज कर जंगली साहब की कोठी में सहेज कर रख दिया गया था जो आज भी यहां पर सुरक्षित है। इसके अलावा नेहरू का मनाली की वादियों से खासा लगाव रहा है। विश्व धरोहर गांव नग्गर में भी नेहरू का आना-जाना रहता था वहीं,नग्गर स्थित आर्ट गैलरी में भी चाचा नेहरू अक्सर घूमने जाते थे। मनाली के कोठी स्थित जंगली साहब की कोठी जिसे अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था के नाम से मशहूर इस भवन के स्वरूप में हल्का परिवर्तन किया गया है, लेकिन भवन के मूल ढांचे से छेड़छाड़ करने में पुरी तरह से सावधनी बरती गई है। परिधि गृह को समय के अनुसार आधुनिक बनाने की मुहिम में भवन के पुराने कुछ कमरों और बरामदों को उखाड़कर डायनिंग हॉल व बाथरूम का निर्माण किया गया है। देवदार के स्थान पर अन्य किस्म की लकड़ी का प्रयोग किया गया है। अंग्रेज अधिकारी ने इस रेस्ट हाउस का निर्माण उस दौर में मनाली के मध्य में ऐसे स्थान पर किया था,जहां से कुल्लू की तरफ पूरी पर्वत श्रृंखलाओं का खूबसूरत नजारा दिखता है। अब यह नजारा भी बहुमंजिला निर्माणों के चलते छिपने लगा है। सरकार ने इस भवन के आसपास बहुमंजिला भवनों के बजाय हट्स या एक मंजिल मकान बनाने का नियम रखा था, लेकिन समय के साथ इन नियमों की परवाह करने वाले भी कम ही रह गए हैं। नेहरू से जुड़ी यादों के संदर्भ में कोठी गांव के बुजूर्गों ने बताया कि जब वे छोटे थे उस समय नेहरू जी लाहुल-स्पीति जाते थे तो उस समय वे कोठी स्थित जंगली साहब की कोठी में ठहरते थे और वहां से घोड़ों पर सवार होकर लाहुल की तरफ निकलते थे।1958 में नेहरू लगभग एक महीने के लिए मनाली आए थे। उनके आगमन से पूर्व मनाली में शौचालय के आधुनिक शीट नहीं होते थे। प्रधानमंत्री की व्यवस्था के लिए फ र्नीचर व शीट लगवाने के लिए अमृतसर से अधीक्षण अभियंता बसंत सिंह विशेष रूप से मनाली आए थे। वहीं, नेहरू द्वारा इस्तेमाल में लाए गए चांदी केटी सेट, चम्मच, चीनी मिट्टी के बर्तन व अन्य वस्तुओं को आज भी यहां एक अलमारी में सहेज कर रखा गया है। कुल्लू के पूर्व विधायक व मंत्री स्व. लाल चंद प्रार्थी ने अपनी पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है कि जब प्रार्थी ने नेहरू जी को 1953 में कुल्लू आने निमंत्रण दिया तो उन्होंने कहा कि जब आराम की जरूरत महसूस करूंगा, तो मनाली आऊंगा।चाचा नेहरू 1959 में भी मनाली आए थे। नेहरू के साथ उस दौर में उपायुक्त कांगड़ा एन खोसला ही घूमा करते थे। बंच ऑफ ओल्ड लेटरज को भी नेहरू ने मनाली में ही जोड़ा दिया था। सुरक्षा कर्मियों को वह सदा अपने दूर रहने की हिदायत देते थे, ताकि खोसला के साथ खुलकर मनाली घुमने का आनंद ले सकें। सुरक्षा कर्मियों को गुपचुप जंगलों से होकर सुरक्षा का घेरा बनाना पड़ता था। वहीं, उस समय मनाली के संदर्भ में नेहरू ने दिल्ली में एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘मनाली में साकार मूक वास्तविकता का अनुभव होता है।अंग्रेजों की विरासत इस भवन को आधुनिकता का रंग चढ़ाया जा चुका है। मगर अब किसी भी तरह से छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। अंग्रेजों के साथ-साथ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की यादें इस भवन के साथ जुड़ी हुई हैं। बहरहाल, मनाली का यह भवन परिधि गृह होने के कारण पूरी तरह से सुरक्षित कहा जा सकता है।

कुल्लू-मनाली में रखी है भारत-चीन के बीच हुए पंचशील समझौते की नींव
-वर्ष 1942 व 1958 में चुना एकांत स्थली के रूप में कुल्लूू-मनाली की वादियों को
-नेहरू कुंड और नेहरू पार्क के रूप में आज भी हैं यादें जिंदा
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कुल्लूू-मनाली में भारत-चीन के बीच हुए समझौते की नींव रखी थी। जिसे पंचशील के नाम से जाना जाता है। यहां की शांत वादियों से ही पंचशील का ताना-बाना बुना गया था। इसके अलावा नेहरू की आत्मकथा पर आधारित पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भी इसका स्पष्ट उल्लेख है। पुस्तक के पृष्ठ 364 पर उन्होंने इस बात का जिक्र किया है कि वह उस समय क्रिप्स मिशन की विफलता से परेशान और मायूस थे। ऐसे में उन्होंने नग्गर की शांत वादियों को कर्मक्षेत्र के लिए चुना। नेहरू ने कहा था-मैं पहाड़ों का दिलदादा हूं…कुल्लू-मनाली में एक खामोश हकीकत का एहसास होता है। यही कारण रहा कि पंडित जवाहर लाल नेहरू अपनी जीवनावस्था में दो बार मनाली आए। पहली मर्तबा वर्ष 1942 तो दूसरी बार 1958 में इस शांत वादी की ओर मुड़े। नेहरू का मानना था कि प्रकृति की एकांतस्थली में किसी भी योजना को फलीभूत साकार किया जा सकता है और यहां आत्मिक शांति का आभास होता है। तभी तो अंतरराष्ट्रीय कला प्रेमी रोरिक ने इस स्थल को अपनी कला साधना के लिए चुना। यहां रहते हुए नेहरू ने न केवल फुर्सत के लम्हे बिताए बल्कि ऐसे पुराने पत्रों को भी व्यवस्थित किया, जिसमें देश की आजादी में योगदान देने वाले महापुरूषों के विभिन्न पहलू थे। यह सभी पत्र बाद में बंच ऑफ ओल्ड लैटर के नाम से प्रकाशित हुए। प्रसिद्ध इतिहासकार स्मिथ और पर्जिटर ने भी माना कि हमारे पुराण अमूल्य ऐतिहासिक परंपराओं के कोष हैं और जिन्हें ब्यास ऋषि ने मनाली के आसपास के ही वातावरण में सुव्यवस्थित किया था। बंच ऑफ ओल्ड लैटर भी पिछली अद्र्ध शताब्दी की गाथा है, जो आने वाली पौध के सामने अतीत की घटनाओं की उचित तस्वीर पेश करने में विशेष मार्गदर्शक साबित होगी। नग्गर से लौटने पर दिल्ली में पहुंचने पर नेहरू ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि कुल्लू में एक साकार मूल वास्तविकता का आभास होता है। पंडित जवाहर लाल मनु की नगरी मनाली में रहे जहां आर्यो के पहले राजा ने आर्यावर्त के लिए संविधान बनाया था। उसी नक्शकदमों पर चलते हुए नेहरू ने भी हजारों वर्षों की दास्तां के बाद देश का ऐसा खाका बनाया जिसने खंडित, बेचैन, मायूस और परेशान जन समाज को एक लड़ी में पिरोकर देश को उन्नत राष्ट्र की पांत में खड़ा कर दिया।


नेहरू ने दिलाया कुल्लूू-मनाली को अंतरराष्ट्रीय उभार
वर्ष 1958 के शुरूआत में ही समाचार पत्रों और रेडियो में अटकलों का दौर शुरू हुआ कि नेहरू कुछ आराम करना चाहते हैं। विश्राम के लिए वे किस स्थान को आराम के लिए चुनेंगे। यह राज का प्रश्न बन गया। राज की बातें राज में रही और जब बेपर्द हुई तो कुल्लूू-मनाली पहली बार दुनिया के लिए सुर्खियों में रही। कुल्लूत: देश की कहानी पुस्तक के लेखक व पंजाब विधानसभा के सदस्य लाल चंद प्रार्थी ने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है कि जब उन्होंने चंडीगढ़ में नेहरू को कुल्लू आने का आमंत्रण दिया था तो उन्होंने कहा कि आराम फरमाने के लिए इससे अच्छी जगह है कहां। जब दिल महसूस करेगा तो कुल्लू-मनाली की ओर रूख करूंगा। मनाली में नेहरू कुंड और नेहरू पार्क के रूप में आज भी देश के पहले प्रधानमंत्री की यादें ताजा हैं।

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