दम तोड़ रही परिवारवाद की सियासत

(संजीव शर्मा): जब नरेंद्र मोदी ने पिछले लोकसभा चुनाव में परिवारवाद पर हमला बोला था तो देश ने उन्हें हाथों हाथ लिया था। बाद में भी कई मौको पर उनके श्रीमुख से यह सुनने को मिला “मेरा क्या है” कोई नहीं जिसके लिए कमाऊंगा, इसलिए न खाने दूंगा न खाऊंगा। अब ये तो पता नहीं कि वर्तमान में देश की सियासी तस्वीर पर इसका कितना असर पड़ा है लेकिन यह जरूर साफ़ दिख रहा है कि परिवारवाद की सियासत दम तोड़ रही है। ताज़ा मामला इंडियन नेशन लोकदल यानी इनेलो का है।

पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के परिवार की यह पार्टी बरसों से क्षेत्रीय सियासत की क्षत्रप रही है। अभी भी हरियाणा में यही पार्टी प्रतिपक्ष का खिताब लिए हुए है, कांग्रेस तीसरे नंबर पर है। लेकिन अब इसमें घमासान मच गया है। अभय चौटाला और उनके भतीजे दुष्यंत चौटाला की महत्वकांक्षाएं इस कदर टकराई हैं कि खुद ओम प्रकाश चौटाला को दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ गया है। आगे चलकर परिवार एक रहेगा या अलग यह तो भविष्य बताएगा लेकिन इतना तो हो ही गया है कि ताज़ा विवाद ने इनैलो की चुनावी संभावनाओं पर प्रभाव डाला है।

खैर बात परिवारों की खत्म होती सियासत की हो रही थी। चौटाला परिवार का झगड़ा जरूर नया है लेकिन सियासी परिवारों के झगडे पुराने हैं। इनेलो से पहले सत्ता जाते ही पीडीपी में भी घमासान मचा था। महबूबा के ही परिवार के सदस्यों ने बगावत का राग अलापा था। उससे भी पहले एम् करूणानिधि के जाते ही द्रविड़ मुनेत्र कड़गम भी फूट का शिकार हुई थी। जब तक करूणानिधि थे उन्होंने बेटों स्टालिन और अलागिरी को जैसे तैसे संभाले रखा लेकिन उनके जाते ही तमाम वर्जनाएं टूट गईं और अब स्टालिन और अलागिरी की राहें बिलकुल अलग हो चुकी हैं।

तमिल राजनीति का ही दूसरा ध्रुव एआईएडीएमके भी ऐसे ही हश्र का शिकार हुई। हालांकि जयललिता के अविवाहित होने के कारण यहां विशुद्ध पारिवारिक संघर्ष नहीं था लेकिन शशिकला और दूसरे खेमे एक तरह से परिवार ही थे। उधर यूपी में विधानसभा चुनावों के दौरान यादवों का परिवार बंट गया था। यहां तक कि मुलायम सिंह और उनके बेटे अखिलेश के बीच पार्टी सिंबल को लेकर जंग निर्वाचन आयोग तक गयी थी। अब भले ही बाप बेटा एक हों लेकिन शिवपाल के अलग हो जाने से सपा परिवार बंट गया है।

बिहार में राजद भी इसी राह जाती दिख रही है। तेजस्वी और तेज प्रताप यादव में अनबन की खबरें अब आम हैं। हालांकि लालू अभी मामला पकड़ कर रखे हुए हैं पर अब वो पहले सी बात नहीं है। उधर कभी देश की सियासत में एक अलग रुतबा रखने वाला ठाकरे परिवार भी पूरी तरह बिखरा हुआ है। सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के ही दौर में राज ठाकरे और उद्धव के बीच शीत युद्ध और सत्ता संघर्ष शुरू हो गया था। अब वो चरम पर है और दोनों एक दूसरे को फूटी आंख देखना पसंद नहीं करते। दोनों की अपनी अपनी सेना है और वे अक्सर चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा भी लेती रहती हैं। कुल मिलाकर पिछले दो दशक में परिवारवाद की राजनीति ढलान पर है। ले देकर अब अब्दुल्ला परिवार ही बचा हुआ है।

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