कश्मीर पर राजनीति

जम्मू कश्मीर का मसला एक बार फिर देश का राजनीतिक तापमान बढ़ा रहा है। पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने हाल में कहा कि कश्मीर में ज्यादातर लोग जब आजादी कहते हैं तो उनका मतलब स्वायत्तता से होता है और इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि ऐसे कौन से क्षेत्र हो सकते हैं जहां कश्मीर को थोड़ी और स्वायत्तता दी जा सकती है। बीजेपी ने उनके बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे शर्मनाक बताया।
सोमवार को ही 35 ए से जुड़ी एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई थी जिस पर कश्मीर के अंदर और बाहर सबकी निगाहें लगी हुई थीं। हालांकि कोर्ट ने सुनवाई छह हफ्ते के लिए स्थगित कर दी और इस वजह से यह मामला फिलहाल टल गया है, लेकिन कश्मीर का मसला अपनी संपूर्ण जटिलता के साथ हमारे सामने बना हुआ है।इस बारे में एक धारा शुरू से देश में ऐसी रही है जो यह मानती है कि जम्मू कश्मीर ठीक उसी तरह से देश का एक राज्य होना चाहिए जिस तरह से अन्य तमाम राज्य हैं। कश्मीर के साथ किसी भी तरह का विशेष व्यवहार इसे मंजूर नहीं है। इसके बरक्स दूसरी धारा कश्मीर के अलगाव की मांग का हल उदार उपायों में देखती है। इसका कहना है कि जहां तक हो सके स्वायत्तता देते हुए आम कश्मीरियों का दिल जीता जाए। कश्मीर को लेकर एक तीसरा नजरिया अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान सामने आया। इस अत्यधिक खुले नजरिये ने कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ सहमति की काफी मजबूत जमीन भी तैयार की थी। कहते हैं कि तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ समझौता लगभग तय हो गया था जो आखिरी पलों में टल गया।इस नजरिये की मुख्य बात यह थी कि भारत और पाकिस्तान दोनों को कश्मीर के दोनों हिस्सों का कस्टोडियन मानते हुए ऐसे कदमों पर सहमति जताई गई थी जिनसे सीमा धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती चली जाए। याद किया जा सकता है कि यह खुला रवैया वाजपेयी के उस सिद्धांत पर आधारित था जिसके तहत उन्होंने ‘संवैधानिक दायरे में बातचीत’ की संकीर्ण पड़ती राह की जगह ‘इंसानियत के दायरे में बातचीत’ का विस्तृत मार्ग मुहैया कराया था।बहरहाल, इन तीनों नजरियों की अपनी खूबियां और खामियां हैं। इन पर खुले और दोस्ताना माहौल में ही बातचीत हो सकती है। मगर, मौजूदा सरकार और सत्तारूढ़ राजनीति का ज्यादा जोर पहली धारा पर है। इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि अन्य धाराओं को देशविरोधी बताने और उनके लिए कोई गुंजाइश न छोड़ने की प्रवृत्ति काफी मजबूत होती दिख रही है। इसका कुल जमा नतीजा यह हो रहा है कि कश्मीर मसले से निपटने या उसे हल करने के हमारे विकल्प लगातार कम होते जा रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *