बेबस आंखें देखती रहीं खून पसीने से बनाए आशियाने खाक होते रहे

मंडी। बेबस आंखें देखती रहीं और खून पसीने से बनाए आशियाने खाक होते रहे। न फायर ब्रिगेड पहुंचने की आशा और न ही आग बुझाने के लिए पानी। गगनचुंबी आग की लपटों के बीच डाहरधार गांव के बा¨शदे चाहकर भी अपने आशियाने नहीं बचा पाए। किसी तरह जान बचाकर घरों से बाहर निकले डाहरधार के बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गो की आंखों में भयानक मंजर की तस्वीर साफ देखी जा सकती है।
डाहरधार के बा¨शदे सोमवार के भीषण अग्निकांड के बाद सहम से गए हैं। इन लोगों को अब खुले आसमान के नीचे खेत खलिहानों में रातें गुजारनी होंगी। मेहनत, मजदूरी व खेत खलिहानों में काम कर दो जून की रोटी का जुगाड़ करने वाले डाहर धार के लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि ¨जदगी भर की पूंजी से बनाए उनके आशियाने पलक झपकते ही खाक हो जाएंगे। ग्रामीणों को रंज है कि यदि उनके गांव तक बेहतर सड़क की सुविधा होती तो शायद काफी कुछ बच जाता।गोदी देवी, मित्र ¨सह, ठाकुर दास व गुमत राम ने रुंधे स्वर में बताया कि बेहतर सड़क के अभाव न तो धू-धू कर जल रहे गांव तक अग्निशमन विभाग की गाड़ी पहुंच सकी और न ही पर्याप्त पानी होने के कारण आग बुझाने का कोई दूसरा उपाय किया जा सका। लपटों में खुद की जान जोखिम में कुछ साहसी युवकों ने पशुशाला से मवेशियों को छोड़कर व घर से सामान बाहर निकाला। इस भीषण अग्निकांड के बाद से कई बच्चे और महिलाएं इस कदर सहमे हुए हैं कि चाहकर भी कुछ बोल नहीं पा रहे हैं।