पहाड़ की अनूठी पंरपरा,दिवाली के एक माह बाद मनाई जाती है बूढ़ी दीवाली

-तीन गढ़ों के देवता शमशरी महादेव और टौणानाग की भावपूर्ण विदाई के साथ धोगी बूढ़ी दिवाली संपन्न
-दो दिवसीय इस पर्व में दिखी पुरातन संस्कृति की झलक
-प्रकाशोत्सव के प्रतीक के तौर पर दीये की जगह मशालें जलाने की है रिवायत
-पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर खूब झूमे लोग
-विदाई के इस समारोह में भावुक हुए घाटी के लोग
कमलेश वर्मा (परी)
कुल्लू,18 नवबंर। देशभर में जहां दीवाली पर्व धूमधाम से संपन्न हो चुका है वहीं, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड के कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां दीवाली के ठीक एक माह बाद धूमधाम से बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है। जी हां, कुल्लू ज़िला के आनी व निरमंड में दीवाली के समापन के एक माह बाद बूढी दिवाली का आयोजन हर वर्ष धूमधाम से किया जाता है। यही नहीं सिरमौर जिले के शिलाई के क्षेत्र, शिमला जिले के चौपाल, जनजातीय जिला लाहुल स्पीति और सीमावर्ती उत्तराखंड में भी इस उत्सव को मनाने की पंरपरा है। आनी में यह पर्व तीन गढ़ों के देवता शमशरी महादेव के सम्मान में मनाया जाता है। दो दिवसीय इस पर्व में पुरातन संस्कृति की खूब झलक देखने को मिलती है। एक तरफ जहां प्रकाशोत्सव के प्रतीक के तौर पर जहां यहाँ पर दीये की जगह मशालें जाती हैं वहीं, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर पूरी घाटी झूमती है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी दिवाली के एक माह बाद इस बार 17 व 18 नवबंर को आनी के धोगी में बूढ़ी दीवाली मनाई गई। दो दिवसीय इस पर्व के अंतिम दिन शनिवार को तीन गढ़ों के देवता शमशरी महादेव और टौणानाग की भावपूर्ण विदाई के साथ धोगी बूढ़ी दिवाली संपन्न हुई।इस पर्व के समापन से पूर्व जहां लोग खूब झूमें वहीं, देवताओं की विदाई के समय घाटी के लोग भावुक भी हुए और अगले वर्ष फिर आने के वादे के साथ ही देवताओं को विदा किया। गौर रहे कि दो दिनों के इस देव कारज में रात को देवता शमशरी महादेव की पूजा करके तीन आग की मशालें जलाई जाती हैं उसके बद धोगी गांव के निवासी खूब नाचते गाते हैं और फिर शमशरी महादेव के पुरोहितों द्वारा महादेव को नचाया जाता है और काँव गाऐ जाते है जिसमें किया माऊऐ किया काज बड़ी राजा देऊली राज देऊली वोले देऊलीऐ पारा ओरोऊ आई वुडिली ढेण तैसे नही सुना मेरा काम आदि काँव गाऐ जाते हैं। बुजुर्गों के अनुसार इनको गाने से भूत पिशाच आदि का भय नहीं रहता है। इसके अलावा सुबह के समय एक लंबा रस्सा बनाया जाता है इसे एक विशेष घास से बनाया जाता है जिसे मुंजी का घास कहा जाता है उस रस्सी के अगले सिरे मे महादेव के गुर नाचते हैं और पीछे से लगभग 2000 से लेकर 3000 के करीब लोग नाचते हैं। पूरे मन्दिर के तीन फेरे लगाऐ जाते है और उसके बाद उस रस्सी को काटा जाता है और उस रस्सी को लोग अपने अपने घर ले जाते हैं। कहा जाता है कि इसको अपने घर रखने से चूहे और सांप आदि नही निकलते हैं।

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पहाड़ की दीवाली का क्या है महत्व
पहाड़ की दिवाली का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि जहां देशभर में दिवाली को रामायण से ही जोड़ा जाता है लेकिन यहां की दिवाली का रामायण के अलावा महाभारत से भी जुड़ाव है। आनी,निरमंड में होने वाले इस उत्सव में पहले दिन जहां रात को कबीरी पंडित पंरपंरागत काऊ गीत गाते हैं। इनमें हनुमान के गीत के अलावा हनुमान-सीता संवाद, हनुमान- विभीषण संवाद से लेकर भगवान राम के आयोध्या तक आने का पूरा विवरण पेश किया जाएगा। दूसरे दिन कौरव और पांडव के प्रतीक के तौर पर दो दल रस्साकसी करेंगे। विशेष तौर से बनाई गई मूंजी घास के रस्से से दोनों दल एक-दूसरे के साथ शक्ति प्रदर्शन करेंगे। इसके अलावा रात को एक दल गांव में मशालों के साथ प्रवेश करता है। बूढी दिवाली के अवसर पर पहाड़ में दीये के स्थान पर मशालें जलाने की रिवायत है। यही नहीं इसके बाद लगातार फरवरी माह तक लगातार दिवाली यानि दियाली मनाने का सिलसिला जारी रहेगा। सबसे अंत में फरवरी माह में लाहौल-स्पीति में दियाली मनाई जाएगी। वहां पर भी प्रकाश का प्रतीक मशालें जलाई जाएंगी।
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दीवाली के एक माह बाद क्यों मनाई जाती है बूढ़ी दीवाली
बुजुर्गों के अनुसार जब भगवान राम ने लंका पर विजय का परचम लहराया था और वे 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो उनके अयोध्या लौटने की खुशी में लोगों ने घी के दीये जलाए थे और तब से लेकर पूरे देश में धूमधाम से दीवाली मनाई जाती है लेकिन पहाड़ों पर भगवान राम की लंका पर विजय का पता काफी देर बाद चला था जिस कारण तब से लेकर दीवाली के एक माह बाद बूढ़ी दीवाली मनाने की परंपरा शुरू हो गई। यही नहीं दीवाली के समय जहां दीये जलाने की रिवायत है वहीं , बूढ़ी दीवाली पर लोग दीये के स्थान पर मशालें जलाते हैं। बूढ़ी दिवाली वैदिक पंरपरा का निर्वाह भी करती है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इसका रामायण काल व महाभारत काल से सीधा संबंध रहा है।