मौसम बदलते समय संक्रमणों से बचाती है हवन सामग्री

हवन सामग्री का प्रयोग वातावरण को शुद्ध करता है। चिकित्सकीय दृष्टिकोण से माना जाता है कि यह अनेक प्रकार के हानिकारक जीवाणुओं और विषाणुओं से हमें बचाती है। बशर्ते इस हवन सामाग्री में मिश्रित जड़ी-बूटियां शुद्ध हों और सही अनुपात में हों। यह बात गुरुवार को राजभवन आयुर्वेदिक चिकित्सालय के प्रभारी चिकित्साधिकारी वैद्य शिव शंकर त्रिपाठी ने बताईं।

प्रभारी चिकित्साधिकारी ने बताया कि हजारों वर्षों से पूजा एवं यज्ञ आदि में हवन सामाग्री का प्रयोग होता आया है। हवन कुण्ड में अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए आम के पेड़ की समिधा (लकड़ी) को अधिकाधिक रूप में प्रयोग में लाया जाता है। नवग्रह की शान्ति के लिये भिन्न-भिन्न समिधा (लकड़ी) का प्रयोग किया जाता है। जैसे-सूर्य ग्रह की शान्ति के लिए मदार, चन्द्रमा के लिए ढाक, मंगल के लिए खैर, बुद्ध के लिए लटजीरा, बृहस्पति के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर, शनि के लिए शमी, राहु के लिए दूब, केतु के लिए कुश का प्रयोग किया जाता है।

सप्ताह में दो दिन अवश्य करें हवन
वैद्य शिव शंकर त्रिपाठी ने बताया कि सामान्यतः हवन सामग्री में बालछड़, छड़ीला, कपूरकचरी, नागर मोथा, सुगन्ध बाला, कोकिला, हाउबेर, चम्पावती एवं देवदार आदि काष्ठ औषधियों का मिश्रण होता है, जो वातावरण को शुद्ध और सुगन्धित करता है। हवन सामग्री के साथ गूगल, छोटी कटेरी, बहेड़ा, अडूसा, नीम पत्र, वन तुलसी एवं वाकुची के बीज को मिलाकर यदि हवन प्रतिदिन किया जाय तो वह घर के वातावरण को विसंक्रमित करने में अधिक प्रभावी होगा। जिससे हम अनेक रोगों के संक्रमण से बचे रहेंगे। इस हवन को यदि प्रतिदिन सम्भव न हो तो सप्ताह में दो दिन अवश्य करें।

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